बात बड़ी छोटी और सीधी-सादी है। हालांकि सीधी-सादी बातें ही अमल में सबसे मुश्किल साबित होती हैं। बात यह है कि हम दूसरों के लिए वही कसौटी तय करें जो अपने लिए करना चाहते हैं। ये आसान सी लगने वाली बात सध जाए तो शायद जिंदगी भी मुश्किल न बने। लेकिन समस्या यह होती है कि दूसरे किसी शख्स के मामले में वे कसौटियां हमें बेहद आसान लगती हैं। अगर वे कसौटियां तय हो जाएं और वह उन कसौटियों पर खरा उतर आए तो हम उसे निशाना कैसे बना पाएंगे? हमें उसे क्लीन चिट देनी पड़ जाएगी। और क्लीन चिट दे दी तो फिर उसे खुद से नीचा कैसे समझ और दिखा पाएंगे।
ऐसा न दिखाया तो वह हमारी बराबरी में दिखने लगेगा। बराबरी तो हम कह रहे हैं। वह तो खुद को हमसे बेहतर ही दिखाने लग जाएगा। और हम कुछ कर भी नहीं पाएंगे, क्योंकि हमारी दी हुई कसौटियों पर वह खुद को खरा साबित कर चुका होगा।
इसका हल यह है कि उसे आसान कसौटियां दो ही मत। इतनी कड़ी कसौटी निर्धारित करो उसके लिए कि वह उस पर खरा ही न उतर पाए। फिर, उसकी कड़ी से कड़ी आलोचना करने का विकल्प हमेशा उपलब्ध रहता है।
दिक्कत तब शुरू होती है, जब हमारा अपना काम या व्यवहार सार्वजनिक निगहबानी में आता है। वैसे सार्वजनिक चर्चा का मसला न बने तो भी हमारे लिए तो यह सवाल हमेशा बना ही रहता है कि क्या करें और क्या न करें। यानी कसौटियों की तलवार हमारे सिर पर भी हमेशा लटकती रहती है। लेकिन हमें एहसास होता है कि जो कसौटियां हमने दूसरों के लिए तय की हैं, उन पर अमल मुश्किल है। सो, हम गुपचुप अपने लिए उन कसौटियों से छूट ले लेते हैं।
सावधानी यह बरतते हैं कि इस बात को सबकी जानकारी में नहीं आने देते। कुछ जो बहुत करीब के लोग हैं, जिनसे हम यह बात नहीं छुपा सकते, उन्हें अपना ‘विश्वस्त’ होने का एहसास कराकर काम चलाते हैं। उनसे हमारी अपेक्षा होती है कि वे ये बातें दूसरों को नहीं बताएंगे क्योंकि वे हमारे अपने हैं।
इस तरह अपने और पराये का ऐसा घेरा हमारे इर्दगिर्द खिंच जाता है, जिसके अंदर कैद रहने को हम मजबूर होते जाते हैं। पारदर्शिता और साहस जैसे मूल्य हमारे लिए निरर्थक होते जाते हैं। चाहे-अनचाहे हम इन करीबी लोगों के प्रत्यक्ष या परोक्ष ब्लैकमेल को सहन करते हैं। हमेशा इस डर से घिरे रहते हैं कि इनमें से कोई सबको हमारी असलियत न बता दे। मन ही मन यह प्लानिंग करते रहते हैं कि अगर किसी ने ऐसा किया तो हम बाकी सबकी नजर में उसे झूठा कैसे साबित करेंगे।
ज्यादा आसान विकल्प यह होता है कि विरोधी ही नहीं, इन कथित करीबियों को भी हम तमाम उपायों से साधे रहें। यह सुनिश्चित करते रहें कि उनकी नाक में हमारी नकेल डली रहे हमेशा। इसके दो ही उपाय होते हैं। एक तो यह कि जहां तक हो सके, इन सबको अपने किसी न किसी एहसान तले लादे रहें और दूसरा यह कि उनकी कमजोरियां नोट करते चलें। जब भी मौका आए और हमारा एहसान काम न दे, हम उन कमजोरियों का इस्तेमाल करके उसे अपने खिलाफ जाने से रोक लें।
इस क्रम में क्या करना सही है और क्या करना नहीं, इस सवाल से हमारी दूरी बढ़ती चली जाती है। हम वही करते हैं जिसमें हमारा फायदा हो, जिसमें हम सेफ रहें। इसके बाद एक बड़ा काम सामने आता है जो कुछ हमने किया है और कर रहे हैं, उन्हें सही मानने और मनवाने का। हमारी लगभग सारी बौद्धिक ऊर्जा इसी एक सबसे बड़े काम में लगने लगती है और जिंदगी का, जिंदगी के फैसलों का अंतरात्मा की आवाज से जैसे कोई कनेक्शन ही नहीं रह जाता। फिर होता यह है कि दूर से हम चाहे जितने ऊंचे, जितने सुरक्षित नजर आएं, अंदर ही अंदर थक के चूर हो चुके होते हैं खुद से लड़ते हुए।
जिंदगी जो सीधी-सादी और आसान हो सकती थी, ऐसी गुत्थी बन चुकी होती है जिसे सुलझाना असंभव लगता है। क्या करें, छोटी-छोटी, सीधी-सादी बातें ही अमल में सबसे मुश्किल साबित होती हैं।
(प्रणव प्रियदर्शी ‘जनसत्ता’, ‘लोकमत समाचार’ और ‘नवभारत टाइम्स’ में लंबी पत्रकारीय पारी के बाद फ़िलहाल स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं और यूट्यूब चैनल @dhoop_chhaanv चला रहे हैं।)